तक़रीरों से नुकीले तीर क्यों चलाते हो जनाब,
ये हिन्दोस्ताँ है कुछ तो अदब दिखाइए....
आसमानो से शोले क्यों बरसाते हो ज़नाब,
ये सूखे पत्तों का ढेर है कुछ तो लिहाज दिखाइए..
सब समशीरें चमका कर बैठे है यहाँ,
सब लेकर बैठे है ख्वाहिशे कलंदर बनने की अंदर,
इन ख्वाहिशों को क्यों क्यों जगाते हो जनाब,
कुछ तो रहम कीजिये....
~ अद्वैत