क्या कर रही हो? छीटे उड रही हैं।
बारिश होती है तो तुम तो पागल हो जाती हो।
सही कहा तुमने ।
मैं पागल हो जाती हूँ
लेकिन सिर्फ बारिश में नहीं, हर मौसम में
सर्दी हो
फिजा हो
बहार हो
कोई भी मौसम हो
पता है
मैं अहमदाबाद की गर्मी भी सिद्त से इन्जोय करना चाहती हु
हाय! कितना मजा आता होगा ना, र्गर्मीयो में जेसलमेर की रेत में तपती हुइ गर्मी में नंगे पाँव चलना चाहती हु ।गरम गरम रेत पे नंगे पाँव जल रहे हो, और फिर साहिल की ठंडी रेत पाँव को को छू रही हो ।
तुमने कभी समन्दर देखा हैं? उसने पूछा।
हा। मैं ने कहा।
और नदी ?
हा |
और जिले?
हा, बहोत बार।
मैं ने नहीं देखी। चलो कोई नहीं, एक दिन में वो भी देख लुंगी।
ख्वाब में, उसने कहा।
हा, ख्वाब ही तो सच होते हैं। मैं ने कहा।
हा, लेकिन ख्वाबो की भी कोई हद होती हो। तुम तो बतहाशा ख्वाब देखती हो।
कभी तुम कश्मीर की कश्ती में सेर करती हो
कभी आबू में डूबते सूरज का मंजर देख रही हो
कभी आग्रा का ताजमहल देख रही हो
इतने ख्वाब कौन देखता है। उसने कहा ।
मैं।