इस बार दशहरे में, गजब खेल हो गया भाई,
रावण के लॉजिक के आगे सब फेल हो गया भाई ।
भीड़ जुटी थी लाखो की, रावण को आज जलाने,
सबसे बुरा था, और है वही ,उसको याद दिलाने ।
आवारा, लफंगे, मजनूं तक,भक्ति में सराबोर थे ,
नेता जी भी धनुष-वाण ले,जोश से पुरजोर थे ।
तभी हुआ धमIका, बहुत जोर नहीं, जरा सा
रावण ने आँखे खोली, मुँह से निकली डरी-डरी सी बोली
मैं तो सदिओं पहले मर चूका, मर, राम के हाथो तर चूका
अब मैं नहीं तो बुराई कहाँ से आती है ?
करता कोई और, पागल भीड़ हर साल
मेरे पीछे पर जाती है।
एक नहीं ,अब लाखो रावण घूम रहे ,
कितने अवतार लू , राम भी माथा धुन रहे ।
जलता रावण देख सब तालिया बजायेंगे ,
पाप करेंगे सब, हर साल बस मुझे ही जलाएंगे ।