गरीबी पर चिंतन
यशवंत कोठारी
बिल गेट्स ने कहा है की गरीब राष्ट्र कम हो रहे हैं लेकिन गरीबी बढ़ रही है.अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश ने कहा है की हम ने गरीबी के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा और गरीबी जीत गयी.भारत में बहस गरीबी पर नहीं गरीबी रेखा पर हो रही है .योजना आयोग का नया रूप निति आयोग इस बात पर ही दो साल से चर्चा कर रहा है ,नए आयोग अध्यक्ष भारत की गरीबी को अमरीकी चश्में से देख रहे है. उन को नहीं मालूम की भारत में गरीबी के मापदंड वे नहीं हो सकते जो अमेरिका में हैं.गरीबी नहीं हटा सको तो गरीब को हटा दो, उसे फुटपाथ से हटाओ, उसे झोपडी से हटाओ ,उसे कच्ची बस्ती से हटाओ , उसे शहरों से हटाओं , उसे जनपथ व् संसद मार्ग से हटा दो.
निति आयोग गरीब और गरीबी पर रोज़ नई परिभाषा बनाता है ,जो सत्ता के तो अनुकूल होती है ,मगर गरीब के अनुकूल नहीं होती.गरीब को सोचने समझने का कोई अधिकार नहीं सरकार कहे सो सही . रोटी तक नसीब नहीं .एक वक्त की रोटी के भी लाले है लेकिन सरकार माने तो.शहर में रहने वाला अलग गाँव में रहने वाला अलग तरह का गरीब, दोनों मिल कर अमीर. होना तो यह चाहिए की सरकार अमीरी रेखा तय करे, उसके नीचे के सब गरीब.सब को मदद मिले, सब को रोटी कपडा मकान मिले .लेकिन बुद्धिजीवी गरीबी पर बहस करते हैं ,सेमिनार करते हैं ससुरी गरीबी बढती जाती हैं और अमीरों की अट्टालिकाएं भी बढती जाती हैं .खुद जिओ गरीब को जीने मत दो.चलो भागो यहाँ से, तुम गरीब भिखारी तुम्हारी हिम्मत केसे हुई यहं तक आने की ?