कुछ ओस की बूँदों जैसा है, कुछ शाम की धूप सरीखा है
चख कर देखा है अभी अभी कि इश्क़ मुश्क बिन फीका है
झुकती हैं गर उनकी आँखें, नज़म कोई लिख जाती है
ज़ुल्फ़ें उनकी शैतान बड़ी झुक गालों को चख जातीं हैं
कदम जो डाले थे उनने तो जूती भी भरमाई थी
उनके कंधे पर जब डोली तो चुनरी भी शर्मायी थी
उनके कदमों की आहट से दिल मिट्टी का थम जाता है
उनकी ऐसी ही अदाओं पर मुश्क बड़ा ही आता है
यहीं कहीं देखा मैंने कि इश्क़ भी नाज़ सरीखा है
चख कर देखा है अभी अभी इश्क़ मुश्क बिन फीका है
#VikasBhanti