कविता ..
विषय .हम चुप ही थे ..
गुजरे हैं इस गली से भी तुफान कम नहीं ।
यारों किया है मैने भी विषपान कम नहीं ।।
गूंगा बना के कोई मुझे आदमी कहे ।
इंसानियत का ये कोई अपमान कम नहीं ।।
कुछ लोग बाँटते रहे नारे बसंत के ।
बागो में उगे थे बियाबान कम नहीं ।।
भीडो का शौक है जिन्हें उनसे कहो जरा ।
कुचली गयी है भीड मे मुस्कान कम नहीं ।।
कडियो मे मुझे बंधे नही सच बात है मगर ।
निकले है अपने नाम भी फरमान कम नही ।।
लहरों से अब हिसाब मैं मांगू तो क्या भला ।
डूबे है तट के पास भी जलयान कम नही ।।
लोगो ने तो जबान को दुम में बदल लिया ।
हम चुप ही थे तो ये कोई एहसान कम नहीं ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।