सुदंर कविता ..
विषय .कुछ पता नहीं ..
क्या हो गया हैं मन को ,मुझे कुछ पता नहीं ।
कब से अचेत तन है ,मुझे कुछ पता नहीं ।।
अब तक यही सुना था ,प्रेम का रोग जटिल हैं ।
कब से लगा दिल को ,हमें कुछ पता नहीं ।।
उडते हुए हवा की तरह ,दिन गुजर गये ।
आयेगे न आयेगें ,हमें कुछ पता नहीं ।।
कितने तरह के फूल ,बिछाए थे राह में ।
क्यों चूभ रहे है आज ,मुझे कुछ पता नहीं ।।
अलको की ओट में उठे ,अनुराग के बादल ।
बरसें या न बरसें ,हमें कुछ पता नहीं ।।
यौवन का मधु लुटाती ,मुस्कराती यौवना ।
अपनी भी हो सकेगी ,मुझे कुछ पता नहीं ।।
मिलने को तड़पते हैं ,उम्र हमारी ढल रही हैं ।
तडपेगें और कितना ,हमें कुछ पता नहीं ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।