सुदंर गजल ..
काफिया .अ ।
रदीफ .क्या करोगें ।
दिल ही जो खुश नहीं तो नजारों का क्या करोगें ।
जो खिजा में जिदंगी हो तो बहारों का क्या करोगें ।।
मुकम्मल करोगे कैसे तमन्ना हजार तुम्हारे दिल की ।
जो एक नहीं कभी होती हजारों का तुम क्या करोगें ।।
कोई गुलाब तुमको आ जाए गर पसंद भी ।
लिपटे हैं उनसे कयी कांटे उन कांटों का तुम क्या करोगें ।।
जमाने से अब ये कह दो आशिक नहीं रहा अब वो ।
अब तो गिरा दो इनको दिवारों का तुम क्या करोगें ।।
उल्फत में वो तो उनकी तारें भी तोड़ लायें ।
कोई मगर ये पूछे की तुम इन तारों का क्या करोगें ।।
जब हौसला नहीं था तो समंदर में तुम क्यूं उतरे ।
कश्ती है तलातल में तो किनारों का तुम क्या करोगें ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।