कविता अभी अधूरी है
******************
घास बिछे पहाड़ों पर
जैसे कि अक्सर चित्रकारी
के होते हैं उन पर , उनके छोरों
तक दौड़ती हूँ खुद की ही तलाश में
दौड़ती हूँ रग रग और नसों में
कि सांस किस एक राग की
सांस न रहे
घड़ियाल के चलते कांटों
के बीच, एक कांटे से
दूसरे के कांटो की दूरी बनाकर
घर की रौनकों को जगाने वाली,
औरतों को घर में घुसा कर
चाय का पानी उबालती हूं
कोनो के जाले
ज़मीं पर बिछाकर
और आसमां की झाड़ू
लगवाती हूँ
इन सब के बीच
प्रेशर कुकर की सीटी में
किसी कोने में बिछे सु्स्त
मसालों में खुद को खर्च कर
नया एक प्रयोग कर
खुद को जादूगर समझती हूँ
प्रेम में पड़ीं पागल लड़की सी
जो रोज रोज थोड़ा थोड़ा जलकर भस्म हो रही है
पर कविता अभी अधूरी है