तू नहीं तेरा इश्क...
जो दरक रहा था कुछ रूह से
वह तेरा इश्क था
जो टूट गया था काँच सा
वो तेरा इश्क था।
मैं तो वही थी आज भी
पर वो तू नहीं तेरा इश्क था।
लिए बैठी थी खामोशी से
समेटे अपने ख्वाबों में
न जानती थी छलावा था तू
पर तू नहीं तेरा इश्क था।
वह एक छाया थी मेरे इर्दगिर्द
सोचा वो तू होगा
पर तू नहीं तेरा इश्क था।
चल रही थी कुछ लहरें
साथी बन पवन की
मैं भी तेरे संग थी
पर तू नहीं तेरा इश्क था।
कुछ अश्क बैठे थे
इन चंचल निगाहों में
इंतजार तेरे सदके के
करते थे इन राहों में
वो कोई तो आया था
पर तू नहीं तेरा इश्क था।
आज भी एक जिस्म हूँ
जो भी बेरंग हूँ
है जो नूर कुछ बाकी बचा
वो तू नहीं तेरा इश्क है.....!!
दिव्या राकेश शर्मा