आज मैं इस जगह पर बैठकर जो अफसाना ब्यान कर रही हूँ, वो मेरी ज़िंदगी का एक अनमोल दौर है। उस वक़्त गर्म हवा के थपेड़े भी मुझे ठंडक पहुँचाते थे लेकिन उसी दौर में जब ठन्डी हवाएँ मेरे बदन को सिहराने लगी तो समझ आया कि सब मेरी सोच से परे था। उसका प्यार दिखावा था या फिर मैं ही कल्पनाओं में भटक रही थी। नहीं, नहीं.... उसने तो कभी मुझसे नहीं कहा कि वो मुझसे प्यार करता है। उसे तो आधुनिकता के परिधान से ढकी हुई लड़की नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की महानता को चित्रित करने वाली लड़की पसंद थी। खैर, अपने प्यार को मैं अपना ना सकी या फिर यूँ कहूँ कि मैं उस परिदृश्य में ना ढल पाई, जिसे मैंने सबसे ज़्यादा प्यार किया। आज बस इस जगह पर बैठकर अपने आँखों मे तैरते आँसुओं को मात्र रोक सकती हूँ और अपने प्यार की अच्छी ज़िन्दगी की कामना कर सकती हूँ। दो विचारों का मेल, दो सभ्याताओं का मेल, दो भाषाओं का मेल तो हो ही जाता है। फिर मैं उस मेल का हिस्सा क्यों ना बन पाई? शायद पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण मुझे अपनों से दूर ले गया और आज यह जीवन अवसाद ग्रस्त हो गया है। खैर, मैं फिर भी उसके अच्छे की कामना करूँगी क्योंकि उसने तो मुझे कभी चाहा ही नहीं था।
Written by :- दिव्य © DSR