कब जिएंगे अपने लिए। हम
भाग दोड़ है ये जीवन सारा
ना रात अंधेरा ना दीन उजाला
कब जिएंगे अपने लिए। हम
कभी अपनो के लिए कभी सपनों के लिए
कभी अपनो के सपनों के लिए
कब जिएंगे अपने लिए। हम
कभी रिश्तों का बोझ कभी नोक झोंक
कभी दोस्त दोस्त कभी दुश्मन हीं दोस्त
कब जिएंगे अपने लिए। हम
कभी तन-बदन सुस्तीभरा कभी आखों मेंधुंधलापन
कभी आखें ढूंढ़ती कभी सब पा के भी कम
कब जिएंगे अपने लिए। हम
औरों का दर्द अपना दर्द
औरों की मुश्किलें और मुश्किलों का हल हम
कब जिएंगे अपने लिए। हम