हास ओंठों पर मेरी माँ भारती के आ गया ।
कश्मीर जब माँ भारती की गोद में समा गया।
ध्वज तिरंगा हृदय पर फहराए थी यह लालसा।
वीर धैर्यवान पुत्र दृश्य वह दिखा गया ।
हृदय मे थी हिलोर सबके देशभक्ति की ।
आशा थी लद्दाख को भी निज मुक्ति की ।
आवश्यकता थी दृढ़ इच्छा शक्ति की ।
अतृप्त जम्मू को इच्छा थी तृप्ति की ।
रक्त पिपासु जोकों से मुक्ति वह दिला गया ।
कोठियां विदेशों में जो बनाए बैठे थे ।
दुकाने अलगाव की जो सजाए बैठे थे।
ख्वाब राजशाही का मन मे लाए बैठे थे।
कश्मीरियत की जो जन बलि चढा़ए बैठे थे।
टूटा दिवास्वप्न अब यथार्थ चित्र आ गया ।।
जनता कश्मीर की भी तो हमारी है ।
सबकी कहाँ बनी पाक से यारी है ।
प्रगति को तरसते हर नर-नारी हैं ।
अवसर मिले उन्हेंअब उनकी बारी है ।
काला अध्याय काल-गाल में समा गया ।।
जन-गण-मन ,देखो तुम्हारे साथ है ।
न कोई बाला न बालक अनाथ है ।
पकड़ो जकड़ कर जो बढ़े हाथ है।
कश्मीर मेरी माँ भारती का माथ है ।
सब हों सुखी समृद्ध भाव मन में आ गया ।।