चलो फिर ढूंढते हैं
अपने सपने
जो यहीं कहीं पड़े होंगे,
कुछ हमें झांक रहे होंगे
कुछ इतिहास बन गये होंगे,
कुछ पक्षियों सी उड़ान ले
आकाश में घूम रहे होंगे।
चलो, अपनी बातों को नया करते हैं,
अगल-बगल उग आये खर-पतवार को,
काटने का प्रयत्न करते हैं।
कुछ नदी की बात मान लेते हैं,
कुछ जंगल की बात सुन लेते हैं,
मन में खिले फूलों को
फिर माला में पिरोते हैं।
पगडंडियां अब भी नयी हैं,
गांव अब भी जागते-सोते हैं,
शहर में भी अकेलापन है,
चलो, प्यार से खिड़कियां खोलते हैं,
क्या पता कोई साथी मिल जाय,
बड़ी-बड़ी बातें नहीं
तो छोटा सा क्षण पकड़ लेते हैं,
जो बातें कभी नहीं की अब कर लें,
कोई गाना गुनगुना लें,
एक अपरिचित मुस्कान बिखेर दें,
गलत-सही का विचार छोड़
कुछ क्षण बचपन में गुजार लें ।
**महेश रौतेला