दुर्निर्वार सहज आकर्षण बौद्धिकता करुणा आनन्द
राजस गुण से ओत प्रोत वह स्वामी बना विवेकानन्द
बोल चुके थे सारे वक्ता
अन्तिम था वक्तव्य प्रसंग
भारत का वह तरुण तपस्वी
दुनिया सम्मुख बढ़ा उमंग
अमरीका के भाई बहनों
से सम्बोधन का उद्घोष
करतल ध्वनि प्रतिध्वनित हो रही
देखे ही बनता वह जोश
कंठ साध्य प्रस्फुटित हो रही
वेद तत्व की मीमांशा
एक सूत्र में पिरो रहा था
सब धर्मों की परिभाषा
गूँज रही ऊर्जस्वित वाणी
तन्मय श्रोता भाव विभोर
मन्त्र मुग्ध सी सभा चकित थी
देख रही नव निर्मित भोर
अन्तरतम् की गहराई से
शब्द निकलते थे स्वच्छन्द
दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर
छा सा गया विवेकानन्द
धर्म योद्धा से
कुबेर मिश्र