एक मुलाकात
अाज तो मेहबूबा आई है मेरी
देखने के लिए , खामोशी मेरी
वो पगली..ने कल सुनी नहीं दिल की आवाज
कमखत... आज सुनने की जिद कर बैठी है
आज कब्र सजी है..मेरी उसके मोती (आंसू) से
मानो जन्नत नसीब हो गई.
कल तक वो पर्दे में थी... दीदार के लिए में तरसता था
आज में पर्दे( कब्र का) में हूं.. दीदार के लिए वो तरसी है
आज समझें वक्त का इंसाफ...
हम तो चैन से सो...गए ( कब्र में)
पर उनकी नींद को अपने साथ ही ले आए...
"ब्रिज"