अब वो पहले वाली दीवाली नहीं आती.
गाँव जाने के पहले वाले सप्ताहांत में होने वाली खरीददारी,
बहनों, भाभियों, चाचियों,मामियों की साड़ियाँ
बिंदियाँ, कंगन, नेल पॉलिश, क्लिप्स...
महीनों पहले देखे बच्चों की लम्बाई का अनुमान लगाकर कपड़े
विद्यालय जाने वालों के बस्ते, पानी की बोतलें, लंच बॉक्स.
चीनी -गुड की रेवड़ियाँ, तरह तरह की गजक
डायरियां, कलम, टाफियाँ, चाकलेट...
और भी कुछ...जो किसी को भी दिया जा सके
महालक्ष्मी में जा रहे हैं...
किसी का उपहार छूटना नहीं चाहिए.
सबके लिए ले लिया ना...
कोई छूटा तो नहीं.....
इतना सारा सामान ..कैसे ले जायेंगे..
हमारे सिर्फ दो कपड़े हैं, बाकी सब वहीँ का है.
लम्बी, थकान वाली लेकिन बहुत खूबसूरत यात्रा
उजास और उल्लास से तुम्हारी आँखें ऐसे चमकतीं जैसे ,
बर्फ से ढकी साथ साथ चलती हिमालय की चोटी
सूरज की पहली किरण के स्पर्श से चमकती है.
गगनचुम्बी देवदार से टकरा कर ठंडी हवा के आते ही
तुम अपनी बाहों से मेरे चारों ओर दीवार बना देते.
दूर से देखकर अलग अलग वृक्षों को पहचाने का हमारा खेल चलता
तुम् बचपन की कहानियां फिर फिर दोहराते,
जैसे वो हर घाटी में छुपी बैठी हो, तुम्हे पुकारती हुयीं..
पहुँचते ही तुम्हारा मन करता,
उपहारों की पोटली खोलने का,
न कोई बच्चा अपना न कोई पराया
सब घेर लेते तुम्हे.....
तुम्हारी आँखों की चमक
तुम्हारी वो भुवन मोहिनी हँसी
मेरे लिए पूरी दीवाली थी......
अब वो दीवाली नहीं आती....
गाँव बदल रहा था ....
मैगी, कुरकुरे, टीवी मिलकर
बहुत कुछ बदल रहे थे, तेजी से
वो गाँव की आखिरी दीवाली थी....
किसी ने कहा....
सबको पैसे दिया करो.
तुम्हारी लायी चीज़ें इन्हें पसंद नहीं आतीं अब
गाँव पहले वाला नहीं रहा...
मैंने देखा था
एक चमक को खोते हुए
एक हँसी को फीका पड़ते हुए...
बहुत कुछ दरक गया था तुम्हारे भीतर...
फिर तुमने अपने को संभाल लिया...
हाँ...ठीक तो है. पैसे से सब अपने मन का उपहार ले लेंगे.
उसी समय से, उस चमक भरी दीवाली ने हमारे घर आना बंद कर दिया.
अब वो पहले वाली दीवाली हमारे घर नहीं आती.