कुछ शब्द शहर में मिल जाते हैं
कुछ सत्य गांव में रह जाते हैं,
कुछ पीड़ा मन में भर जाती है
कुछ ममता पैदल चलती है।
कहाँ खड़ा रहूं सब दिख जाये
कहाँ बसूं सब मिल जाये,
किसे पुकारूं जो आ जाये
किसे सुनाऊं जो सुन जाये।
उसने देखा सुबह हुई थी
मैंने देखा सांझ हुई थी,
गुनगुनाने को मन भी था
चुप रहने का दिन भी था।
कुछ मन की बातें हो जाती हैं
कुछ सपने सदा खो जाते हैं,
कुछ स्थान बड़े बन जाते हैं
कुछ बातें, मिट्टी हो जाती हैं।
**महेश रौतेला