#KAVYOTSAV -2
कविता- "पंच-तत्व"
पंच-तत्व से बना शरीर
पंच-तत्व में होगा विलीन
गिनता है दिन रात दौलत
कभी अपने झूठ-साँच गिन
सजाता खुद को झूठ-फरेब से
नहीं संसार में कुछ नेकी बिन
संवारना है खुद को, आत्मा संवार
झूठे आचरण से क्यूँ करे मलिन
आडम्बर छोड़, स्वार्थ रख परे
शून्य बन कभी तू स्वयं से मिल
© vineetapundhir