“खुशी”
ढुंढती थी इधर उधर, भटकती थी दरबदर,
ए खुशी, तु मुजको मेरे भीतरसे मीली।
चली थी दुनिया बदलने के लिए,
अच्छाइ का सबक सबको सिखाने के लिए,
खमिया तो मुजमे ही दीखी, शुरुआत अपने आपसे की,
खुदको बदला तो ए दुनिया, तु अपने आप बदल गई।
ए खुशी, तु मुजको मेरे भीतरसे मीली।
खना नहि, खिलाना है, लेना नहि देना है,
हासिल तो खोनेमे है, असली मझा खिशिया लुटाकर जिनेमे है।
ईन उसुलो पर चली तो जिंदगी बडी खुबसुरत लगने लगी।
ढुंढती थी इधर उधर, भटकती थी दरबदर,
ए खुशी तु मुजको मेरे भीतरसे मीली।
- जुली