#काव्योत्सव -2
#प्रेम
***अनकही***
कहना तो बहुत चाहा,
पर अनकहा
सा रह जाता है ।
दर्द जब उभरता ,
आंसुओं की स्याही बन ,
लेखनी में उतर जाता है ।
काश ! ……. .
तुम समझ पाते ,
मेरे मन की बात ,
यूं तो हो ( कहने को )
साथ रहते …..
पर नहीं समझते जज्बात ,
चाहती थी प्यार का,
एक अपना आकाश ,
एक दूसरे में खोए ,
कोई ना हो पास ।
तुमने पूरी कर दी
सब की मुराद ,
पर ना जाने क्यों ?
मेरी पूरी ना हुई आस ,
प्यासा , यह मन मेरा ,
पपीहा सा तड़प रहा ,
प्यार की प्यास ,
कलम से टूटता ,
मेरा अनकहा , हर सांस ।
साजिशों को मात कर ,
बंधनों को तोड़कर ,
कहना तो चाहता है
पर बहुत कुछ ,
अनकहा रह जाता है ।
नमिता "प्रकाश"