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NAzm-" किताबों की महक"
मैं जिस बक्से में किताबें रखता हूं
उसी बक्से में अपने कपड़े भी रखता हूं।
सारी किताबों की महक
ऐसे बस गई है मेरे कपड़ों में
जैसे तुम्हारा चेहरा
पहली नज़र में
मेरी आंखों में बस गया था।
मैं जब भी कोई कपड़ा पहनता हूं
ये ख़ुश्बूएं
ऐसे लिपट जाती हैं मेरे सांसों से
जैसे तुम लिपट जाते थे बिजली कड़कने पे मुझसे।
ये ख़ुश्बूएं
एक चेहरा लिए
एक अक्स लिए
तैरती रहती हैं सांसों के सामने
सांसें देखती रहती हैं
कभी ग़ालीब को
कभी फ़ैज़ को
कभी फराज़
कभी बशीर
तो कभी गुलज़ार को।
Written by-"NISHANT"