कतरा कतरा
कतरा कतरा बह गया
फिर भी नमी बाकी है।
यादों को भूल गई हूँ मैं
फिर भी कमी बाकी है।
महसूस कर रही हूं हर पल
तेरे वजूद को इस जिस्म में
जिंदगी तो रही नहीं अब बस
रूह की मौत आनी बाकी है।
दो कदम चल कर यूँ जब
तुम राह में लड़खड़ाए थे,
तेरे चलते हुए उन कदमों के
वह निशां जमीं पर बाकी है।
हाथों पर लिख दी थी जो
अनकही इबारतें तुमनें,
मिट गई थी तेरे जाते ही
पर स्याही अभी बाकी है।
चंद लम्हों को समेटे रखा था
चादर में लपेट कर मैंने
सलवट तो हट गई थी पर
खूशबू उनकी अभी बाकी है।
गुजर जायेगी यह रात भी
आती जाती साँसों में
शमां भी बुझ गई है पर
चमक आज भी बाकी है।
दिव्या राकेश शर्मा।