Megha in kavyotsav.
#KAVYOTSAV -2
निकल पड़ीं थी मैं यूहीं सच की तलाश में-२
कई सच मिले,
कई जुठ मिले,
कई चाहने वाले,
तो कई अनचाहे,
निकल पड़ी थी मै,,,,,,,,
कई मौन मिले तो,
कई चह -च हा ते
कई मुखौटे पहने तो,,,
कई रंगमंच के मंजे।
निकल पड़ी थी मैं,,,,,,,,,
और फिर तुम मिले!!!!!!!!!
मानो अपने आप से मिली मै,,
पत्थर से तुम,
मानो मोम से पिघले तुम
मेरे आशुओ की धारा से तुम,
मेरी खुशियों के पहरेदार से तुम,
जानती हूं आखरी सांस तक रहोगे तुम,,,
मेरी अग्नि चिता के साक्षी तुम,
मेरी राख को माथे से लगाए तुम,
मैंने फिर अपनी भभूत को पाया
अंग लगाया,,,,,
और तुम्हे पाया,,,,,
निकल पड़ी थी मै यूहीं सच की तलाश में,,,,,
मेघा....
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