घर की इज़्ज़त का पुलिंदा
अपने सर ढोती हैं लड़कियाँ ...
दिन भर झूठी हँसी - हँसकर
रात में चुपके से रोती हैं लड़कियाँ ...
ख़्वाब आँखों में कोई पल भी जाये तो क्या !
ख़ुद ही उसे तोड़कर , सब्र बोती हैं लड़कियाँ ...
अरमानों में लिपटे दिल को रखती हैं बड़ा संभालकर
घुट - घुटकर जी लेती हैं , पर मन का कहाँ बोलती हैं लड़कियाँ ...
सब कुछ पीछे छोड़ कर अपना , आ जाती हैं इस आँगन
फिर भी घर के हर कोने में अपना वजूद खोजती हैं लड़कियाँ ...
अनचाहे फैसलों को क़िस्मत का लिखा मानकर
बेमन ही सही , आजीवन उसे भोगती हैं कुछ लड़कियाँ..
ये समाज , ये दुनिया , ये लोग क्या कहेंगे !!
बस यही सोच -सोचकर ...
कितना कुछ खोती हैं लड़कियाँ ...
:-)