मेज पर रखी
किताबों में चढ़ी
धूल में दिखता है
मेरे बाबूजी का रिटायरमेंट।
बेतरकीब से रखे
पेन में भरी
सूखी स्याही से टपकता है
मेरे बाबूजी का रिटायरमेंट।
खूँटी पर टँगे
कुर्ते में पड़ी
सिलवटों से सरकता है
मेरे बाबूजी का रिटायरमेंट।
आँखों पर लगे
टूटे चश्मे से बंधे
धागों में उलझता है
मेरे बाबूजी का रिटायरमेंट।
हथेली में बंधी
रुकी उस घड़ी की
सुइयों में चलता है
मेरे बाबूजी का रिटायरमेंट।
कभी धूप - कभी छाँव में
कभी शहर - कभी गाँव में
गुमसुम से बैठे
बाबूजी की
झुर्रियों में झलकता है
अब
उनका रिटायरमेंट।