#आध्यात्म
कश्मकश..
न जाने कैसी कशमकश है..
हाथ में कलम है ..
मन में शब्द है ..
सामने कागज का टुकड़ा पड़ा है ..
फिर भी शब्द कतराते हैं..
कागज़ पर उतरने से ..
पड़ा रहता है मेज पर ..
बर्फ सा कागज़ का टुकड़ा..
मानो मन को मेरे टटोल कर..
यह भी मुझ सा हो गया हो..
सोचता हूं तुम ही कुछ कह दो ..
तो यह उदासी की बर्फ पिघले ...
तुम्हारी आवाज़ की गर्माहट से ..
कुछ शब्द फिर से उकेर कर ..
मैं तुम्हारे हवाले कर दूं..