गर तुम जूठ होते तो हम हम नहीं होते,
ये शाम न होती,ये महफ़िल हुई न होती।
गर तुम जूठ होते तो ये सांसे मूजमे न होती,
होंठो पे हसीं न होती, आंखों में नमी ही होती।
हर पल ख़्वाबों खयालों में मेरे तुम ही रहती,
दिल से निकलती मेरी हर सांसो में तुम ही रहती।
कहे कुछ भी ये ज़माना नहीं फ़िक्र मुझे उसकी,
गर नसीब हो जाए मुझे चाहत तेरी उम्र भर की।
जी जाऊंगा अपनी मर्ज़ी से भी कहीं में ज्यादा,
गर मिल जाए साथ तेरा मांगा है उससे भी ज्यादा।
रवि नकुम 'ख़ामोशी'