#काव्योत्सव
#प्रेम
याद है
जब तुमने परत दर परत
खोला था मेरे अहसासों को
छेड़ा था मन के तारों को
दिखाए थे सतरंगी सपने
उड़ाकर ले चले थे बादलों पर
आसमान के अंतिम छोर तक
बौने लगने लगे थे सारे रिश्ते
जहां साथ थे सिर्फ तुम
भरम लगता अपना होना भी
अचानक ही हो गया वो समां
कुछ धुआं-धुआं सा
हटा जब कोहरे का आँचल
तब देखा तो...
बिखरे पड़े थे अहसास
टूटे हुए थे मन के तार
बदरंग हो गए थे सारे सपने
लड़खड़ाने लगी मैं बादलों पर
किन्तु फिर भी.......
आते-आते अपने साथ ले आयी
आसमान से चंद सितारे तोड़कर
ताकि टांक सकूँ उन्हें दामन में
एक बार फिर सजा सकूँ
अपनी दुनियां को
क्योंकि....
टूटे तो थे मेरी उम्मीदों के मीनार
पर मैं न टूटी थी कभी....।
प्रिया