काव्योत्सव2.0
पुराने पेड़ की बगिया हमें हर दम पुकारेगी,
कोई आकर भगीरथ तार दे आँखे निहारेंगी,
बचा लूँ इस धरा को ऐसा तू वरदान दे दाता,
नहीं कुछ चाहिए बस इतना सा तू ज्ञान दे दाता।।
गली है मौन वो आएगी तब झाड़ू लगाएगी,
हमारे स्वार्थ का कूड़ा वो आ करके उठाएगी,
गिरूं ना अपनी नजरों में ना बच्चों को गिराऊं मैं,
नहीं कुछ चाहिए मुझको यही श्रमदान दे दाता।।
क्या लौटेंगे जो दिन बीते हमारी बुढ़िया काकी के,
धरा है माँ कभी कहते थे कुर्ता पहन खादी के,
अब वो दिन हैं जो माँ रहती है वृद्धाश्रम के आँगन में,
मेरी मुस्कान के बदले उसे मुस्कान दे दाता।।
जो थे रक्षक, बने भक्षक, है जाने कैसी लाचारी,
सिसकती है गली में प्यारी सी बिटिया की फुलवारी,
यहाँ किसको कहूँ कि कौन सच्चा कौन झूठा है,
धरा के बूथ पर आकर तू ही मतदान दे दाता।।
-राकेश सागर