॥ तंग दायरें ॥
काव्योत्सव -2
'भावप्रधान 'कविता
पहले तो घरों की
एक पहचान हुआ करती थी,
एक बड़ा सा आंगन
और सहन हुआ करती थी ,
खुले - खुले घर ,
और खुले हुए थे मन ,
समाते थे जिसमें ढेर सारे जन,
हर कोई अपना ,
सगा सा लगता था ।
कुछ भी ना था बेगाना ,
सब अपना सा लगता था ,
अब घर बड़े हो गए हैं ,
और दीवारें हो गई ऊंची ,
बड़े आंगन सा मन,
कब हो गया छोटा ,
अब घर कहां ?
वो तो कैद खाने हो गए ,
,जो लगते थे अपने ,
कब के बेगाने हो गए,
जितने हैं लोग ….
उतने जोड़ी खिड़की दरवाजे हो गए ,
सुकून की चाहत में,
तंग दायरे हो गए ।
कल तक जहां हम ,
संग ,साथ खेलते थे ,
आपस में लड़कर ,
झगड़े सुलटा लेते थे ।
सब मिलकर आपस मे ,
सपने बुनते थे ,
एक ही थाली में मिल बांट खाते थे ।
ना जाने कब ……….?
पहले तौलिए ,चादरे और कमरे ,
फिर सामान बँटते गए ,
संयुक्त परिवार अब ,
एकाकी होते चले गए ।
सबके बुनें सपनों को ,
किस रावण ने चुरा लिया,
दरकती दीवारें …..
छोटी से बड़ी हो गई,
मैं सुन सकता हूं उनको ,
चाह कर भी देख नहीं सकता,
या देखना नहीं चाहता ,
जहां एक दिन भी ,
बिना बोले रहा नहीं जाता था,
वही ……….
पिताजी के जाते ही ,
बिना बोले महीनों हो जाते हैं,
जो' सबका 'था ,
आज वह 'मेरा' हो गया ,
अर्थ की अंधी दौड़ में ,
सवेरा भी खो गया ,
अब चीखता है दिल ,
टीसता है मन ,
फिर से अपनों को पाने को ,
एकाकीपन से दूर जाने को ,
पर -----
लाँघ नहीं सकती दीवारें ,
तोड़ नहीं पाती मीनारें ,
पास होकर भी कितने दूर हो गए,
उनके ठहाकें और मेरी कसक ,
दोनों ही मजबूर हो गए ,
अनजान बन कर ‘गिरा ‘दी गई ,
“अपनों की चाहत ,”
“अहम” के घरों में कैद हो गई ।।
नमिता “प्रकाश”