#काव्योत्सव2 .0#गीत
तमन्ना है तेरे सजदे में मैं कुर्बान हो जाऊं,
चले जो पीढ़ियों तक वो बना दालान हो जाऊं,
ये क्या हिंदू, ये क्या मुस्लिम, हैं सब बेकार की बातें,
पले इंसानियत जिसमें मैं वो दालान हो जाऊं।।
फिक्र किसको है रिश्तों की, सब अपने आप में उलझे,
है कैसा स्वार्थ का जाला, सुलझकर भी जो ना सुलझे,
ना मुझको दीद की चाहत ना जन्नत की तमन्ना है,
मैं था इंसान, रहूँ इंसान, और इंसान हो जाऊं।।
-राकेश सागर