#काव्योत्सव
#प्रेम
आज फिर याद आ गया कोई
भीगी हुई धड़कनों को
थमी-थमी सी इन साँसों को
सोई हुई आरज़ूओं को
आज फिर जगा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई
आँखों के इकरार को
खोये हुए उस प्यार को
लौट आने की उम्मीद को
सपनो के लिए मचलती नींद को
आज फिर उकसा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई
चल रही मध्यम सी पुरवाई को
कानों में गूंजती शहनाई को
उन यादों के मौसम को
आज फिर महका गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई
मिट्टी की उठती सौंधी महक को
कोयल की चहकती कूक को
बरसते हुए पहले सावन को
आज फिर आग लगा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई
सपनो के उन रंगीन बादलों को
आवारा पागल से अरमानों को
पल दो पल की चैन वाली नींद को
आज फिर सता गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई
चाँद से निकलती चाँदनी को
दिए से उसकी रौशनी को
इन हसीन वादियो की रंगत को
आज फिर बुझा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई ।
प्रिया