#KAVYOTSAV --2
# भावना प्रधान
कलयुग की कथा
कलयुग की कथा सुनो लोगों..
कलयुग का रूप निराला है।
गोरी चमड़ी वाला बाबू...
अंदर से बिल्कुल काला है।
वो चुप -चुप आश्रम में रोए...
क्या पाप किया सोचे धोए..
मैं काट रही हूं धतूरे क्यों...
मैंने बीज आम के थे बोए।
जिस मां ने कोख में रख्खा था..2
उसको ही घर से निकाला है।
गोरी चमड़ी वाला बाबू
अंदर से बिल्कुल काला है।
जब सांसें बड़ -बड़ करती थी
बहुऐं सहमी सी रहती थी
वो दर्द सहीं अंदर-अंदर..
अपनों से कुछ नहीं कहती थी
अब बड़- बड़ बहुऐं करती हैं..2
और सास के मुंह पर ताला है
गोरी चमड़ी वाला बाबू
अंदर से बिल्कुल काला है
मैंने देखा नहीं बुरा उनका
लोगों ने फिर भी दगा किया
मैं जानू या मेरा रब जाने...
मैंने घूंट जहर का कैसे पिया।
नफरत का ज़हर उगल डालो...2
पिओ, प्रेम शहद का प्याला है।
गोरी चमड़ी वाला बाबू..
अंदर से बिल्कुल काला है।
सीमा शिवहरे" सुमन"
भोपाल मध्यप्रदेश