#KAVYOTSAV -2
मौसमे गर्मी
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नीर ,नीरज ,अम्बुज ,वारिद,
कहाँ खो गये जीवन तुम,
उड़ि उड़ि फिरते वन प्राँतर में,
ग्राम, नगरिया, मेघा तुम,
सूरज तपता हवनकुँड सा ,
पवन बनी है लू लपटें ,
कंक्रीट का जंगल बोया,
बंजर खेत, प्रेत से झपटें.
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जीव जन्तु हैं भूखे प्यासे ,
किरणें बोतीं हैं अंगारे .
कैसे भरे पेट अब उनका ,
मानव तू अब चेत जा रे .
पालन पोषण कर जीवन का,
पर्यावरण बिगाड़ न रे ,
हरियाली है अति आवश्यक,
जल संरक्षण करना रे,
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खाली खाली मन चौबारा,
सूखी सूखी ये धरती,
जीव मात्र है आस लगाये ,
हरिया जाये ये परती.
आँखे टँग गईं आसमान पर,
ठूँठ हो रहा पेड़ पियासा.
सड़क बढ़ाने बृक्ष उखाड़े,
चिड़िया चुनमुन पँख जला सा.
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कहाँ बने अब ठौर घोंसला ,
पक्षी बने हुये हरकारे,
नदिंयाँ बन गईं ताल तलैया ,
ताल बने हैं पोखर रे,
,प्यासा हूँ , पपीहा पुकारे,
प्यासे फिर रहे ढोर डाँगरे ,
आँगन कुँआ , बाग वावड़ी ,
सब तू संरक्षित करना रे
मानव ! तू पानी पिला रे .
हे नर ! तू सबको जिला रे.
शोभा शर्मा,
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