#काव्योत्सव २ #प्रेम
अलख जलाके मै तेरी
नंगे पैर चलता हूं।
कभी मै आंहें भरता हूं
कभी दीदार करता हूं।
कभी ना कह सका तुझसे
ले ऐलान करता हूं
मुझे तुझसे मोहब्बत है
तुझी से प्यार करता हूं।
लबालब है तेरी हसरत से
मेरी चाह का बर्तन
बिना सोचे, बिना समझे
तुझी पे जां है ये अर्पन।
जलाई भी थी लौ तूने
मेरे दिल के कोने में
कभी तू चांद सी लगती
सितारों के बिछौने में।
तू मीठी है नदिया सी
में समुंदर सा हूं खारा
लगा दे तू ही साहिल पे
मै तो हूं कश्ती आवारा।