#काव्योत्सव -2
तुमने....
ज़र्रा थी मै, आफताब बनाया तुमने।
मुजको मुजसे मिलाया तुमने........
मौन की एक मूरत थी मै,
हंसना मुझे सिखाया तुमने,
मुजको मुझसे मिलाया तुमने........
अनदेखे मेरे ख्वाबों को,
बड़े प्यार से सजाया तुमने,
मुजकों मुझसे मिलाया तुमने.......
नजरअंदाज कर मेरी गलतियां,
हरपल साथ निभाया तुमने,
मुजको मुझसे मिलाया तुमने.......
बदली निराशा की घिर आई,
हौंसला भी तो दिलाया तुमने,
मुजको मुझसे मिलाया तुमने.......
मेरी हर इक इक मर्जी को,
अपनी मर्जी बनाया तुमने,
मुजको मुझसे मिलाया तुमने......
इतना प्यार ना कर ओ साथी!
मुजको खुदपे गुरूर हो जाए।
आए मौत मुझे अगर कभी।
वापस जाने पे मजबुर हो जाए......
जागृति राठौड़.