रात
रात ये निःशब्द है,
फिर भी शोर कर रही;
कितनी बेचैनियों को,
ले कर है चल रही !!
रात ये सुनसान सी,
सज-धज के बैठ गई;
कितनी उमंगों को,
ख़्वाहिशों से जोड़ रही !!
रात ये निस्तब्ध सी,
सन्नाटे तोड़ती ;
कितने जज़्बातों में ,
हौसलों को फूंकती !!
रात अपने आँचल में,
तारे समेटती ;
ओढ़ शीतलता को,
ओस ये बिखेरती !!
रात निःशब्द है,
रात सुनसान है,
रात निस्तब्ध है,
जितनी ये प्यारी है ;
उतनी अजीब है।।
रात ये अजीब है
रात ये अजीब है ....
~बोधमिता~