#KAVYOTSAV -2
ज़िंदगी के कश्मकश में इस कदर यू में सोचता हूं की इस तरफ कुआ तो इस तरफ खाई हैं,
कभी तो यू सोचता हूं कि अपने ही कर्मो की परछाई हैं,
या तो अपनों ने ही तो यह नहीं सजाई हैं,
सोच रहा हूं कि अपनों कि सोच नीची थी
या मेरी ही आसमान छूने की ख्वाइश थी,
लगता है अब तो अपने लिए जीने कि वजह ही मैने खो डाली है,
मौत का तो क्या हे उसे भी मोहब्बत की तरह अपना लेंगे पर यह सपने.. यह सपने कम्बक्त मोहब्बत करने नहीं देंगे
इसलिए तो ज़िंदगी के कश्मकश में इस कदर युही मे सोचता हूं कि इस तरफ कुआ तो इस तरफ खाई हैं।
- क.शा