उदासी के मौसम ने इस तरह घेरा है।
न ढलती रात और न होता सवेरा है।
थम सी गई जिंदगी बनकर एक शाम।
और दिल पे मायुसियो का पहरा है।
दर्द सारा छिपा मुस्कुराहट के पीछे।
एक आंसू!पलको पे जाके ठहेरा है।
कोई वजह भी नहीं मिलती गम की,
बेवजह जैसे दिल पे डाला डेरा है।
किसे कहे खतावार और किसे दोषी,
है दर्द या खुशी!जो भी है बस मेरा है।
ना शिकवागिला,ना शिकायत किसिसे,
साथ मेरे , मेरी तन्हाइयों का मेला है।
जागृति राठौड़।