Hindi Quote in Religious by Jani Krishna

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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् |
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ।। 



जैसे सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर से समुद्र में आकर मिलता है| पर समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है। अर्थार्थ समुद्र अपना आकर, व्यवहार और अपनी प्रकर्ति में कोई परिवर्तन नहीं लाता|

ऐसे ही मनुष्य को भी सांसारिक भोग पदार्थों  को प्रयोग करते हुए भी आशक्ति नहीं होनी चाहिए| किसी भी रिश्ते वस्तु और सांसारिक भोग पदार्थों से लगाव ही मनुष्य के दुःख का कारण हो, जो मनुष्य सांसारिक वस्तुओं और भोगों का प्रयोग करते हुए इनसे लगाव और आशक्ति नहीं रखता वही परम शुख को प्राप्त करता है|

Hindi Religious by Jani Krishna : 111132086
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