बाबूजी का बाउंसर
#moralstories
बाबूजी के कमरे से ज़ोर ज़ोर से खासने की आवाज़ आने लगी| थोड़ी देर सन्नाटा छा गया, दिल की धड़कन दुगनी हो गयी, पैर सुन्न पड़ चुके थे| यह ख़ामोशी किसी खतरनाक अंजाम की और इशारा कर रही थी| कांपते हाथो से बाबूजी के कमरे का दरवाज़ा खोला तो पैरों तले ज़मीन खिसक गयी,
बाबूजी की आँखें खुली की खुली थीं और वह बुरी तरह गहरी-गहरी साँसे ले रहे थे, इस तरह का मंज़र पहली बार आँखों के सामने था, क्या करें क्या ना करें कुछ समझ नहीं आ रहा था, जैसे तैसे कर के फोन ढूंढ कर घर पर एम्ब्युलंस बुलवाई, घर से अस्पताल का सफ़र सिर्फ दस मिनट का था फिर भी मीलों की दुरी लग रही थी|
अस्पताल में डॉक्टर नें बाबूजी की नब्ज़ देखी तो उनके माथे पर चिंता की लकीरे साफ़ दिखने लगी| उन्होंने गुस्से भरी निगाहों से मेरी और देखा और कहा की जल्दी नहीं ला सकते थे| यह शब्द सुन कर मेरा दिल बैठ सा गया| बदन में कपकपी दौड़ गयी| मन ज़ोर ज़ोर से रोने को कर रहा था|
एक ही पल में बचपन से ले कर जवानी के सारे अच्छे बुरे पल किसी फिल्म की रील के जैसे चलने लगे जो मैंने बाबूजी के संग बिताये थे| धैर्य धीरे धीरे जवाब दे रहा था| बिस्तर पर बेसुध से पड़े बाबूजी की सांसे धीमी मद्दम पड़ रही थीं|
अचानक डॉक्टर वहां से धीरे धीरे चलते हुए मेरे करीब आये और उन्होंने भारी मुख के साथ मेरे कंधे पर हाथ रख दिया और कुछ बोलने ही जा रहे थे की, मेरे पुरे बदन में डर के मारे सनसनी सी दौड़ गयी|, मुझे जिस अनहोनी का डर था, शायद वही हकीकत का रूप लेने जा रही थी| मै अब फुट फुट के रोने ही वाला था की,,,
गहेरी सांस लेते हुए डॉक्टर नें कहा.... बाबूजी को रात में भारी खाना खिलाओ तो एकाद हाजमोला की गोली या थोडा कायमचूर्ण दे दिया करो, और 20 से 50 कदम चलने को बोला करो, पेट की गैस के मामले में इतना हल्ला मचा के अस्पताल की अम्मा-आंटी करने की ज़रूरत नहीं है बेटा – जय हिन्द
मोराल – हर भावुक परिस्थिति का अंजाम करुण और दर्दनाक नहीं होता है, कभी कभी ऐसे पोपट भी बन जाता है| - हँसते रहो|