#moralstories
पश्चाताप
अभी कुछ ही देर हुई थी दीपक को घर से गए कि सुमन ने फिर से बूढ़ी सास पर तंज कसा, "बेटा चला गया ना, तो अब तुझे कहना पड़ेगा तीन दिन तो खूब आराम फरमा लिया", यह कहते हुए सुमन सास के आगे कपड़ों का ढेर पटक गई l बूढ़े और कमजोर घुटनों से जैसे तैसे सास कपड़े धोने बैठ गई कि तभी दीपक फिर आ गया और हंसकर कहने लगा, "मां लाओ में कपड़े धो दूँ, तुम थक गई होगी"l बूढ़ी आँखे आंसुओं से डबडबा आईं और बचपन के छोटे दीपक की यादें कहीं गायब हो गई l जैसे तैसे दिन कट जाते, कभी बहू के ताने सुनकर, तो कभी यादों के सपने बुनकर, कभी वह जिंदगी की मोहताज़ होती तो कभी मौत की l दो वक्त का बासा खाना, और और घर का सारा काम यही थी उसकी जिंदगी, कोई भी वक्त हो बचपन के दीपक और उसके पति की यादें उसको हर पल घेरे रहती जिनसे वो अपने सारे दुख भूल जाती वरना इस वो कबकी जीवन से मुक्त हो चुकी होती l आज दीपक फिर से दो महीने बाद लौटा, देर रात थी मां सो चुकी थी, सुमन ने तरह तरह के पकवान बनाए थे, दीपक भरपेट खाना खाकर सोने ही वाला था कि मां के कराहने की आवाज आई, दीपक दौड़कर गया, उसे देख कर माँ रोने लगी और बोली, " हमेशा खुश रहना मेरे लाल, बहू का ध्यान रखना" l "ऐसे क्यूँ कह रही हो माँ, क्या हुआ? " भरे गले से दीपक ने कहा और माँ का सिर अपनी गोद में रख लिया, दीपक मां को थपथपाने लगा और कुछ ही देर बाद माँ गहरी नींद में सो गई थी अब वो बिल्कुल ठीक थी और आजाद भी, तभी तेजी से आती हुई गाड़ी एकदम रुकी तो खिड़की पर खड़ी सुमन का ध्यान टूटा, उदास नज़रों से उसने दीवार पर टंगी दीपक की तस्वीर को देखा कि तभी राजू ने आवाज लगाई, "मां जल्दी बाहर आओ आश्रम की गाड़ी आ गई है", सुमन कमजोर घुटनों से रुक रुक कर बाहर आने लगी उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू भरे थे पर बूढ़ी सास का चेहरा उसे डब्डबाई आँखों से भी साफ दिखाई दे रहा था l