बेशक मैं टूट गया हूं,
पर बिखरा नहीं अभी तक।
बदल दूंगा इस वक्त को,
मैं उजड़ा नहीं अभी तक।
हालात ए मुश्किल के सागर में,
मैं गिर गया हूं बेशक।
कर लूंगा मैं पार इसको,
डूबा नहीं अभी तक।
परिस्थितियां हैं उल्टी जानता हूं,
अपने हो गए बेगाने मानता हूं।
मोड़ दूंगा मैं वक्त को वापिस,
मुश्किल राहों से गुजरना मैं जानता हूं।
आज बिछे हैं कांटे राहों में,
परवाह मुझे नहीं है।
खड़ा हूं भीड़ में अकेला,
आश्चर्य मुझे नहीं है।
बेशक मैं असहाय हूं,
निर्जीव तो किंतु हुआ नहीं।
अथक परिश्रम कर लूंगा,
मैं सांसों से वंचित हुआ नहीं।
रोहित कुमार