#moralstories
इहलोक
"सुनो ना तुम्हे खूब अच्छा अच्छा मिलता है न खाने को अब ?? हर चीज तुम्हारी पसन्द का था कल ..!"बूढ़ी की जीभ में मानों बाढ़ आ गयी
"हां री, पर कोई फायदा नही ..!" बूढ़े की आंखे डबडबा गयी
"क्यों ? फायदा क्यों नही , अरे अब तो मन का खा रहे हो न ? बूढ़ी ने तुनक कर कहा
"हम्म सो तो है.." बूढ़े ने चुप रहना ही उचित समझा
जानते हो मुझे सब पागल समझते हैं , पर उन्हें क्या पता में तुमसे बातें कर रही हूं.. सोचती हूं जल्दी ही तुम्हारे पास आ जाऊं , कम से कम मन का खा तो पाऊंगी .."
"हां सही कहा , जीते जी तो कोई एक गिलास पानी देने में भी सौ गालियां देता था , इससे बेहतर तो तू भी ये "इहलोक" त्याग कर चली आती मेरे पास..ऐसे इहलोक से तो परलोक ही भला..!"
........
कविता जयन्त