?रीती-रिवाज खुद के न मालुम तो दुसरो के ना पता हो तो उसमें बुरा मानने की नहीं बल्कि समझाने / समझने की बात है |...ॐD
?अब बहोत बडा समुदाय ऐसा है जीनको उनके खुद के घर के धर्म/ज्ञाती/जाती आदी के रीती- रीवाजो का पता नहीं होता तो जाहिर सी बात है दुसरे के रीति-रिवाज का ना पता हो |
? जैसे कोई ब्राह्मण है उसका दोस्त दरबार है स्कूल में इकट्ठे ब्राह्मण और दरबार के बच्चे पढ़ते हैं घर पर दरबार के बच्चे को अलग नाम से पुकारते हैं और स्कूल में बच्चा जाता है तो उसके दोस्त उसको अलग नाम से पुकारते हैं जैसे कि उसका नाम है पवन सिंह तो ब्राह्मण का लड़का उसे पवन केह कर ही पुकारेगा क्योंकि उसे पता नहीं कि यह उसके रीति रिवाज में आता है | यहां नासमझी में लोग झगड़ा कर बैठते हैं कि ऐसे तुमने बुलाया ही क्यों मेरा मजाक उड़ाया ही क्यु ? पवन सिंह केह कर ही बुलाना है बच्चों को तो पता ही नहीं और फिर बात बड़ों तक पहुंचती है | बड़े भी अपने रीति रिवाज समझाने के बदले यही है ऐसा ही है केहकर अपनी बात मनवाने में पड़ जाते हैं | ऐसा ही बोलना है इसे समझ ही नहीं है यह वो कैसे बोल पाए भला !?! समज नहीं इसलिए तो बोला | तो ये समझ और सुझबुझ से काम लिया जाता है ये रीति - रिवाज घर तक, घर्म तक, ज्ञाति तक, जाती तक सीमित रखने होते है कोई ब्राह्मण का बच्चा स्वेच्छासे स्वीकार कर अपने दोस्त को पवन कहे या पवनसिंह केहकर बुलाए तो उसमें कोई आपत्ती नही होनी चाहिए न ब्राह्मण को न दरबार को...ॐD