... उड़ान इस स्वच्छ गगन में
पूरा आसमान मेरा भी होता
कहलाती आधी आबादी
पर पूरा अधिकार मेरा ही होता
मैं जो चाहती वो कर जाती
कोई रोक न टोक होती
काश की मैं लड़का होती
होते सपने मेरी मुट्ठी में।
पर क्या मैं भी ऐसी ही होती
जैसे मिलते है रोज मुझे
क्या चाहती मैं भी छूना
हर रोज नया अहसास मैं लेती
तर करती मैं आँखें और मन
जज्बातों की परवाह बिना
क्या मैं भी समझौते करती
सपनों के जज्बातों के
अहसासों के वादों के...
फिर भी काश की मैं लड़का होती
होते सपने मेरी मुट्ठी में।।।