अरे बचपन तेरे लिये तो
मैं कई जन्म रूका रहा।
कुछ खिलखिलाने का मन था
कुछ मुस्काने का दिल बना था,
कुछ बिना बात चलने का नशा था
कुछ बिना कहे समझने का शौक था।
वह खेत को सींचने की बात थी
वह जंगल का बड़ा साथ था
वह अजीब सी लिखा-पढ़ी थी
वह अद्भुत मन में उछाल था।
अरे बचपन तेरे लिये तो
मैं कई जन्म रूका रहा,
कुछ नींद तुझमें ऐसी थी
कुछ खेल न्यारे-प्यारे थे।
कुछ हँसी चुराने की अदा थी
कुछ टेड़ी-मेड़ी दौड़ थी,
कुछ शब्दों का भँवर था
कुछ प्यार के झोंके थे।
**महेश रौतेला