कागज़ पर मत धुंध मेरे जज़्बातों को..
में धुवे पर अपनी कहानिया लिखती हूं...
रूकती हूं एक पल के लिए ही तेरी सांसो में..
में हवा हु,में कहा ठहरती हूं ?
घुलती नही हूं में मिशरी सी पानी में...
में तेल हू..अलग ही तेर ती हूं.
मत कर तू बाते महखाने की..
गर पानी भी बनू, तो शराब से ज़्यादा चढ़ती हूं..
जा नाप ले ऊंचाइयां अम्बरो की,परवाह किसे हे?
में मछली हूं उन सागरो की,गहराइयों में ही तैरती हूं..
खुशबु नहीं में जो तेरी सांसों में रेह जाउंगी..
में रेत हु रेगिस्तान की,तेरे हाथो से फिसल जाउंगी..
लहर नहीं हूं में जो एक मौज बन कर बेह जाउंगी..
कहर हूं, या समज जहर हूं,तुजे तबाह ही कर जाउंगी.
गुलाब नही हूं, जो सिर्फ गुलिस्तां में ही मिलूंगी जाउंगी...
थॉर हूं, कांटो से भरी,रण में भी खिल जाउंगी...
में ख्वाइश नहीं हूं तेरी,जो दुवाओ से पूरी हो जाउंगी..
में चिंगारी हूं आग की,धुवा बन कर उड़ जाउंगी...
ANV◆