क्या रिश्ते वाक ही इतने उलझे होते है जितना हम समजते।
या फिर हम इतना सुलझे नहीं की रिश्तों को समजते।
जो बात दिल से बोल नी चाहिए उसे दिमाग से है बोलते।
और जिन बातों में वजन ही नहीं खाम खा उन्हें है तोलते।
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क्या रिश्ते वाक ही इतने उलझे होते है या फिर हम उन्हें उलझा देते है?